ज़िन्दगी

बीते हुए कल की मुश्किलों से लड़कर,
कभी उनसे जीतकर, तो कभी हारकर ,
रोज़ सुबह जब उठता हूँ,
तब लगता है, की ज़िन्दगी कितनी अच्छी हैअपनी कल्पनाओं में खोये लेखकों की रचनायें पढ़कर,
कभी उन पर हंसकर, कभी खुद पर रोकर,
जब आइना देखता हूँ,
तो लगता है, की ज़िन्दगी कितनी सच्ची हैनाकामियों से लड़ते उस श्रमिक को देखकर,
प्यार में खोये पंछी की तरह उड़कर,
जब आखें पूरी खोलता हूँ,
तो देखता हूँ की ज़िन्दगी में कितने रंग हैं

पैसों की लालच में डूबे उन ‘धनियों’ का सुनकर,
अपने जीवन की पाई पाई दूसरों के नाम करने वालों का
जब नमन करता हूँ,
तो लगता है, की ज़िन्दगी जीने के कितने ढंग हैं

इस ज़िन्दगी के ऐसे अनगिनत पहलुओं को छूकर
ग़मों को बुलकर, सुनेहरी यादों में डूबकर,
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो ज़िन्दगी फिर से जीने का मन करता है

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